Shri Ganapati Atharvashirsha | श्री गणपती अथर्वशीर्ष in Devanagari Script

Shri Ganapati Atharvashirsha | श्री गणपती अथर्वशीर्ष

श्री गणपती अथर्वशीर्ष (Ganapati Atharvashirsha) का पाठ सभी प्रकार के कष्टों को दूर करने के लिए आप सफलतापूर्वक कर सकते हैं। गणपति जी को जैसे लाल फूल प्रिय है उसी तरह से उन्हें दुर्वा भी प्रिय है। इसीलिए जब किसी मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए आप गणपति अथर्वशीर्ष का यदि प्रयोग करें।

गणपति अथर्वशीर्ष का यदि प्रयोग करते समय गणपति जी को मन ही मन में प्रार्थना करते हुए उन्हें चंदन, गंध, अक्षत, हल्दी-कुमकुम, दूर्वा तथा लाल फूल अर्पण करें। धूप और दीप दिखाकर अपने इच्छा को संकल्प के तरीके से उच्चार करते हुए अथर्वशीर्ष का पाठ करें।

इसके पाठ सुबह के स्नान के पश्चात, या तो शाम के समय कर सकते हैं। अथर्वशीर्ष के सहस्त्र आवर्तन (atharvashirsha sahatravartana) करके भगवान गणेशजी को पूजने की भी प्रथा महाराष्ट्र में है। हम आपके लिए गणपती अथर्वशीर्ष हिन्दी में (Ganapati Atharvashirsha in Hindi) लेकर आए है।

गणेश उत्सव (Ganesh Utsav) के दरमियान मराठी घरों में अथर्वशीर्ष का पाठ सुबह शाम किया जाता है तथा कई घरों में सहस्त्र आवर्तन का भी आयोजन करते हैं। कई गणेश पंडालों में भी सामूहिक तौर पर अथर्वशीर्ष सहस्त्र आवर्तन का आयोजन किया जाता है।

 Atharvashirsha Prarambh | अथर्वशीर्ष प्रारंभ

श्री गणेशाय नम:

(शांतिमंत्र)
ॐ भद्रं कर्णेभि शृणुयाम देवा:।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा:॥
स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनुभिर्व्यशेम देवहितं यदायु: ॥१॥

ॐ स्वस्ति नऽ इन्द्रो वृद्धश्रवा:
स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्र्योऽ अरिष्टनेमि:॥
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥२॥

ॐ शांति:। शांति:।। शांति:।।।

॥ अथ गणेशाथर्वशीर्ष व्याख्यास्याम: ॥

ॐ नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि॥
त्वमेव केवलं कर्त्ताऽसि। त्वमेव केवलं धर्ताऽसि॥
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि। त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि॥
त्वं साक्षादत्माऽसि नित्यंम् ॥१॥

ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि ॥२॥

अव त्वं माम्। अव वक्तारम्॥
अव श्रोतारम्। अवदातारम्॥
अव धातारम अवानूचानमव शिष्यम्॥
अव पश्चातात्। अव पुरस्तात्॥
अवोत्तरातात्। अव दक्षिणात्तात्॥
अव चोर्ध्वात्तात। अवाधरात्तात॥
सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात् ॥३॥

त्वं वाङग्मयस्त्वं चिन्मय:।
त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममय:॥
त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽसि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्माऽसि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥४॥

सर्व जगदि‍दं त्वत्तो जायते।
सर्व जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्व जगदिदं त्वयि लयमेष्यति॥
सर्व जगदिदं त्वयि प्रत्येति॥
त्वं भूमिरापोनलोऽनिलो नभ:॥
त्वं चत्वारिवाक्पदानी ॥५॥

त्वं गुणयत्रयातीत: । त्वं अवस्थात्रयातीत:।
त्वं देहत्रयातीत: त्वं कालत्रयातीत:।
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम्।
त्वं शक्तित्रयात्मक:॥
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यम्।

त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं।
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुव: स्वरोम् ॥६॥

गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरम्॥
अनुस्वार: परतर:। अर्धेन्दुलसितं॥
तारेण ऋद्धम्। एतत्तव मनुस्वरूपम्॥
गकार: पूर्व रूपम् अकारो मध्यरूपम्।
अनुस्वारश्चान्त्य रूपम्। बिन्दुरूत्तर रूपम्॥
नाद: संधानम्। संहिता संधि:। सैषा गणेश विद्या॥
गणक ऋषि: निचृद्-गायत्री छंद:। ग‍णपतिर्देवता॥
ॐ गॅं गणपतये नम: ॥७॥

एकदंताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दंति: प्रचोदयात्॥८॥

एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्॥
रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम्॥
रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्॥
रक्त गंधानुलिप्तागं रक्तपुष्पै सुपूजितम् ॥

भक्तानुकंपिन देवं जगत्कारणम्च्युतम्॥
आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृतै: पुरुषात्परम॥
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर: ॥९॥

नमो व्रातपतये नमो गणपतये नम: प्रथमपत्तये
नमस्तेऽ अस्तु लंबोदारायैकदंताय विघ्ननाशिने शिव सुताय।
श्री वरदमूर्तये नमो नम: ॥१०॥

फलश्रुती

एतदथर्वशीर्षं योऽधीते। स: ब्रह्मभूयाय कल्पते॥
स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते। स सर्वत: सुख मेधते ॥
स पंचमहापापात्प्रमुच्यते।

सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति॥
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति॥
सायं प्रात: प्रयुञ्जानो अपापो भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति॥
धर्मार्थकाममोक्षं च विदंति ।

इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम॥
यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान् भवति॥
सहस्त्रावर्तनात्। यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत् ॥११॥

अनेन गणपतिमभिषिं‍चति। स वाग्मी भ‍वति॥
चतुर्थत्यांमनश्रन्नजपति। स विद्यावान् भवति॥
इत्यर्थर्वण वाक्यम्॥
ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्। न बिभेती कदाचनेति ॥१२॥

यो दूर्वांकुरैर्यजति। स वैश्रवणोपमो भवति॥
यो लाजैर्यजति। स यशोवान भवति। स: मेधावान् भवति॥
यो मोदक सहस्त्रैण यजति। स वांछितफलमवाप्नोति॥
य: साज्य समिद्भिर्यजति। स सर्वं लभते स सर्वं लभते ॥१३॥

अष्टो ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा। सूर्यवर्चस्वी भवति॥
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिभासंनिधौ वा जप्त्वा। सिद्धमंत्रो भवति॥
महाविघ्नात्प्रमुच्यते। महादोषात्प्रमुच्यते॥
महापापात्प्रमुच्यते। स सर्व विद्भवति स सर्वविद्भवति।
य एवं वेद। इत्युपनिषत् ॥१४॥

शांतिमंत्र

ॐ सहनाववतु। सहनौ भुनत्त्कु।
सहवीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥

ॐ शांति: शांति: शांति:

ॐ भद्रं कर्णेभि शृणुयाम देवा:।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा:॥
स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनुभिर्व्यशेम देवहितं यदायु: ॥१॥

ॐ स्वस्ति नऽ इन्द्रो वृद्धश्रवा:
स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्र्योऽ अरिष्टनेमि:॥
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥२॥

ॐ शांति:। शांति:।। शांति:।।।

॥ इति गणपत्यथर्वशीर्षम समाप्तम्॥

Atharvashirsha & Falshruti | अथर्वशीर्ष  और फलश्रुति

अथर्वशीर्ष फलश्रुति में जैसे बताया है कि, जो भी इस का पाठ करें वह ब्रह्म स्वरूप में लीन होते हैं। सर्व विघ्नों की बाधा दूर होकर उसे सुख प्राप्ति होती है। पंचमहापापों से मुक्त होकर उसे मुक्ति मिलती है। जो शाम के समय पठन करें उसके दिन के समय में किए हुए पापों से मुक्ति होती है; जो सुबह पठन करें उसके रात के समय किये हुए पापों से मुक्ति होती है। सुबह शाम इसका पठन करने वालों के सभी दोषों से मुक्ति होती है। हर समय पठन करने वाले भक्तों के सारे विघ्न दूर होकर उसे चार धामों की प्राप्ति होती है। 

जो अथर्वशीर्ष के साथ गणपति का अभिषेक करें वह वक्ता बनता है, चतुर्थी के दिन इसका जाप करने वाला विद्यावान होता है। जो इसका पठन करके दुर्वा होम करता है वह कुबेर बनता है। जो लाही का होम करते हुए इसका पठन करने वाला यश और बुद्धि प्राप्त करता है। जो होम करते हुए सहस्त्र मोदक दान करता है उसे मनोवांछित फल प्राप्ति होती है। जो कोई सच्चे मन से सीखनेवाले आठ साधकों को अथर्वशीर्ष सिखाता है तो वह व्यक्ती सूर्य के भांति तेजस्वी बन जाता है।

 How to read Atharvashirsha | अथर्वशीर्ष का पठन कैसे करें

काफी लोग इसका पाठ “ॐ नमस्ते गणपतये” से शुरू करते हैं, लेकिन आप यदि एक बार पठन करते हैं तो भी आप इसे शांति मंत्र से शुरू करके जो “ॐ भद्रं कर्णेभि:” से शुरू होता है, से लेकर “ॐ स्वस्ति न इंद्रो” इस श्लोक के अंत तक करना होता है।  इसके पहले 10 श्लोक महत्वपूर्ण है। यदि आप  नित्य पाठ करते हैं, जिसमें आप केवल एक ही बार अथर्वशीर्ष पठन करने वाले हैं तो फलश्रुति नहीं भी पड़ेंगे तो भी ठीक है। 

 How to do Atharvashirsha Sahatra Awartan | अथर्वशीर्ष सहस्त्र आवर्तन कैसे करें

अपने मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए गणेश भगवान के सामने बैठकर, हाथ में जल लेकर, संकल्प करें। गणेश जी को लाल फूल, दुर्वा, गंध, अक्षत, धूप, दीप, मोदक या मिठाई का भोग लगाकर सहस्त्र आवर्तन करें। सहस्त्र आवर्तन करते समय शांति मंत्र से शुरू  करते हुए पहले 10 श्लोक तक ही, जो “श्री वरद मूर्तये नमो नमः” यहां तक पढ़ें और दूसरी बार से पढ़ते समय “ॐ नमस्ते गणपतये” इस प्रथम श्लोक से शुरू करते हुए दसवे श्लोक तक एक हजार बार तक पढ़ें।

एक हजार (१०००) बार पाठ पूरा होने के पश्चात फलश्रुति जो, “एतद् अथर्वशीर्षं योSधिते” से शुरू होने वाले पूरे चार (४) मंत्र पढ़ने के बाद “ॐ सहनाववतु” और “ॐ स्वस्ति न इंद्रो” यह दो शांति मंत्र बोलकर अथर्वशीर्ष के सहस्त्र आवर्तन की समाप्ति करें। इसके पश्चात भगवान गणेश जी को कर्पूर आरती और घी के दीपक से आरती करें और आशीर्वाद लें। गणपती आरती मराठी (Ganapati Aarati in Marathi) या गणपती आरती हिन्दी (Ganapati Aarati in Hindi) यहाँ पढ़िये।

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Ganapati Atharvashirsh in English

Ganapati Atharvashirsha

॥ Shree Ganapati Atharvasheersha ॥
॥ Shaanti Mantra ॥
Om bhadram karnebhih shrunuyaama devaa ।
bhadram pashyemaakshabhiryajatraaha ॥
sthirairangaistushtuvaamsastanoobhihi ।
vyashema devahitam yadaayuhu ॥
om svasti na indro vriddhashravaaha ।
svasti nah pooshaa vishvavedaaha ॥
svastinastaarkshyo arishtanemih ।
svasti no brihaspatirdadhaatu ॥
om shaantih । shaantih ॥ shaantihi ॥

harih om namaste ganapataye ॥
tvameva pratyaksham tattvamasi ॥ tvameva kevalam kartaasi ॥
tvameva kevalam dhartaasi ॥ tvameva kevalam hartaasi ॥
tvameva sarvam khalvidam brahmaasi ॥
tvam saakshaadaatmaasi nityam ॥ 1 ॥

ritam vachmi ॥ satyam vachmi ॥ 2 ॥

ava tvam maam ॥ ava vaktaaram ॥
ava shrotaaram ॥
ava daataaram ॥ ava dhaataaram ॥
avaanoochaanamava shishyam ॥

ava pashchaattaat ॥ ava purastaat ॥
avottaraattaat ॥ ava dakshinaattaat ॥
ava chordhvaattaat ॥ avaadharaattaat ॥
sarvato maam paahi paahi samantaat ॥ 3 ॥

tvam vaangmayastvam chinmayah ॥
tvamaanandamayastvam brahmamayah ॥
tvam sachchidaanandaadviteeyosi ॥
tvam pratyaksham brahmaasi ॥
tvam jnyaanamayo vijnyaanamayosi ॥ 4 ॥

sarvam jagadidam tvatto jaayate ॥
sarvam jagadidam tvattastishthati ॥
sarvam jagadidam tvayi layameshyati ॥
sarvam jagadidam tvayi pratyeti ॥
tvam bhoomiraaponalonilo nabhah ॥
tvam chatvaari vaakpadaani ॥ 5 ॥

tvam gunatrayaateetah॥ tvamavasthaatrayaateetah ॥
tvam dehatrayaateetah॥ tvam kaalatrayaateetah ॥
tvam moolaadhaarasthitosi nityam ॥
tvam shaktitrayaatmakah ॥
tvaam yogino dhyaayanti nityam ॥

tvam brahmaa tvam vishnustvam rudrastvam
indrastvam agnistvam vaayustvam sooryastvam chandramaastvam
brahmabhoorbhuvahsvarom ॥ 6 ॥

ganaadim poorvamuchchaarya varnaadim tadanantaram ॥
anusvaarah paratarah ॥
ardhendulasitam ॥ taarena ruddham ॥
etattava manusvaroopam ॥
gakaarah poorvaroopam ॥
akaaro madhyamaroopam ॥
anusvaarashchaantyaroopam ॥
binduruttararoopam ॥ naadah sandhaanam ॥
samhitaasandhih ॥ saishaa ganeshavidyaa ॥
ganakarishihi ॥ nichridgaayatreechchhandaha ॥
ganapatirdevataa ॥ om gam ganapataye namah ॥ 7 ॥

ekadantaaya vidmahe । vakratundaaya dheemahi ॥
tanno dantih prachodayaat ॥ 8॥

ekadantam chaturhastam paashamankushadhaarinam ॥
radam cha varadam hastairbibhraanam mooshakadhvajam ॥
raktam lambodaram shoorpakarnakam raktavaasasam ॥
raktagandhaanuliptaangam raktapushpaih supoojitam ॥
bhaktaanukampinam devam jagatkaaranamachyutam ॥
aavirbhootam cha srishtyaadau prakriteh purushaatparam ॥
evam dhyaayati yo nityam sa yogee yoginaam varah ॥ 9 ॥

namo vraatapataye । namo ganapataye । namah pramathapataye ।
namastestu lambodaraayaikadantaaya ।
vighnanaashine shivasutaaya ।
shreevaradamoortaye namo namah ॥ 10 ॥

॥ Phalashruti ॥

etadatharvasheersham yodheete ॥ sa brahmabhooyaaya kalpate ॥
sa sarvatah sukhamedhate ॥ sa sarva vighnairnabaadhyate ॥
sa panchamahaapaapaatpramuchyate ॥
saayamadheeyaano divasakritam paapam naashayati ॥
praataradheeyaano raatrikritam paapam naashayati ॥
saayampraatah prayunjaano apaapo bhavati ॥
sarvatraadheeyaanopavighno bhavati ॥
dharmaarthakaamamoksham cha vindati ॥
idamatharvasheershamashishyaaya na deyam ॥
yo yadi mohaaddaasyati sa paapeeyaan bhavati
sahasraavartanaat yam yam kaamamadheete
tam tamanena saadhayet ॥ 11 ॥

anena ganapatimabhishinchati sa vaagmee bhavati ॥
chaturthyaamanashnan japati sa vidyaavaan bhavati ।
sa yashovaan bhavati ॥
ityatharvanavaakyam ॥ brahmaadyaavaranam vidyaat
na bibheti kadaachaneti ॥ 12 ॥

yo doorvaankurairyajati sa vaishravanopamo bhavati ॥
yo laajairyajati sa yashovaan bhavati ॥
sa medhaavaan bhavati ॥
yo modakasahasrena yajati
sa vaanchhitaphalamavaapnoti ॥
yah saajyasamidbhiryajati
sa sarvam labhate sa sarvam labhate ॥ 13 ॥

ashtau braahmanaan samyaggraahayitvaa
sooryavarchasvee bhavati ॥
sooryagrahe mahaanadyaam pratimaasamnidhau
vaa japtvaa siddhamantro bhavati ॥
mahaavighnaatpramuchyate ॥ mahaadoshaatpramuchyate ॥
mahaapaapaat pramuchyate ॥
sa sarvavidbhavati sa sarvavidbhavati ॥
ya evam veda ityupanishat ॥ 14 ॥

॥ Shaanti Mantra ॥

om sahanaavavatu ॥ sahanaubhunaktu ॥
saha veeryam karavaavahai ॥
tejasvinaavadheetamastu maa vidvishaavahai ॥
om shaantih । shaantih ॥ shaantih ॥

om bhadram karnebhih shrinuyaama devaa ।
bhadram pashyemaakshabhiryajatraah ॥
sthirairangaistushtuvaamsastanoobhih ।
vyashema devahitam yadaayuh ॥1॥

om svasti na indro vriddhashravaah ।
svasti nah pooshaa vishvavedaah ॥
svastinastaarkshyo arishtanemih ।
svasti no brihaspatirdadhaatu ॥
om shaantih । shaantih ॥ shaantih ॥2॥

॥ iti shreeganapatyatharvasheersham samaaptam ॥

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